वैद्यकलानिधि सी. एन. नारायणन
जन्म तिथि :- 25 जून, 1924
जन्म स्थान::- रुवल्ली, तहसील कंजीरापल्ली, ज़िला कोट्टायम, केरल, भारत
व्यक्तिगत एवं पारिवारिक विवरण:- सी.एन. नारायणन, सी. के. नारायणन वैद्यन (जो विषवैद्य अर्थात् टॉक्सिकोलॉजी के विशेषज्ञ थे) और कुंजिपेन्नु (गृहणी) के चौथे पुत्र थे। उन्होंने 1950 में पी. एन. शारदा से विवाह किया और उनके तीन संतानें हुईं। ज्येष्ठ पुत्र एम. एन. ससीधरन (जन्म 1951), कन्या एम. एन. सुषीला (जन्म 1953), कनिष्ठ पुत्र एम. एन. मुरलीधरन (जन्म 1955) ।
दोनों पुत्रों ने अपने पिता के पदचिह्नों पर चलकर आयुर्वेद को अपनाया। डॉ. एम. एन. ससीधरन वर्तमान में कोट्टायम, केरल स्थित अप्पावु वैद्यन की आयुर्वेदिक चिकित्सालय में प्रधान चिकित्सक के रूप में कार्यरत हैं। डॉ. एम. एन. मुरलीधरन 2015 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सोसायटी से मुख्य चिकित्सा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए।
शैक्षिक योग्यताएँ :-
सी. एन. नारायणन ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सेंट मैरी प्राइमरी स्कूल और एस. सी. टी. एम. स्कूल (चेरुवल्ली) से प्राप्त की। उच्च शिक्षा देवस्वोम बोर्ड हाई स्कूल, कंगाझा, कोट्टायम से पूरी की। इसके बाद उन्होंने आयिरूर आयुर्वेद हाई स्कूल (आयिरूर मना द्वारा संचालित पाठशाला) से तीन वर्षीय वैद्यशास्त्री कार्यक्रम किया। तत्पश्चात उन्होंने सरकारी आयुर्वेद कॉलेज, तिरुवनंतपुरम से पाँच वर्षीय डिग्री “वैद्यकलानिधि” अर्जित की।
व्यावसायिक यात्रा:-
एक शोधकर्ता के रूप में: 1950 में उन्होंने अपने ससुर अप्पावु वैद्यन द्वारा संचालित वैद्यशाला (नर्सिंग होम) का दायित्व संभालते हुए चिकित्सकीय अभ्यास आरंभ किया।उन्होंने आयुर्वेदिक औषधियों में प्रयुक्त औषधीय पौधों पर गहन शोध किया और उनके उपयोग का दस्तावेजीकरण किया।उन्होंने शोडशांगम क्वाथ नामक एक नई औषधि विकसित की, जो उच्च रक्तचाप (Hypertension) के लिए अनुशंसित की जाती थी।उन्होंने कई दुर्लभ या लगभग लुप्त हो चुकी आयुर्वेदिक औषधियों को पुनर्जीवित किया, जैसे—कोम्पंचड़ी गुटिका, कृमिसुदर्शनम्, पंचबाण सिंधूरम् आदि।
एक लेखक के रूप में:- उन्होंने तीन पुस्तकें लिखीं, जिनमें 'वैद्यतरकम' भी शामिल है, जो कौमारभृत्य (आयुर्वेद बाल चिकित्सा) पर एक व्यापक पुस्तिका है। 'वैद्यतरकम' में, उन्होंने उस युग की आम बाल रोगों, जैसे खसरा, कण्ठमाला, काली खांसी और पोलियो, के व्यावहारिक उपचारों का विस्तृत विवरण दिया। उन्होंने आयुर्वेद के क्षेत्र की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, 'आयुर्वेद चंद्रिका' और 'आयुर्वेद रत्नम' के संपादक के रूप में भी कार्य किया।
पुरस्कार एवं सम्मान :- वैद्य वाचस्पति पुरस्कार (1975)
प्रमुख उपलब्धियाँ: ‘वैद्यतारकम्’ की रचना की, जो आयुर्वेद के छात्रों को कौमारभृत्य की परंपरागत समृद्ध जानकारी तक पहुँच प्रदान करती है।उन्होंने पाठ्यक्रम संशोधन, औषध निर्माण नीतियों तथा आयुर्वेदिक ज्ञान के प्रसार में योगदान दिया। अपनी पुस्तकों और सफल उपचारों के माध्यम से उन्होंने बालचिकित्सा (Balachikitsa) को जनमानस में लोकप्रिय बनाया।एक नवोन्मेषी सुधारक के रूप में उन्होंने आयुर्वेदिक बाल-चिकित्सा (कौमारभृत्य) को स्थायी और महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उल्लेखनीय प्रकाशन
| वैद्यतारकम् | 1974 में प्रकाशित |
| गर्भप्रकाशम् | 1977 में प्रकाशित |
| आयुर्वेद तरंगम् | 1998 में प्रकाशित |



























































