
आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय
जन्म तिथि :- 2nd 2 अगस्त, 1861
जन्म स्थान::- रारुली ग्राम, जेसोर (अविभाजित बंगाल)
व्यक्तिगत एवं पारिवारिक विवरण:- जेसोर स्थित बोधखाना के राय परिवार को सत्रहवीं शताब्दी से ही समृद्ध एवं उत्साही परिवार के रूप में जाना जाता है। इस वंश में श्री माणिकलाल राय उल्लेखनीय व्यक्तित्व रहे, जिन्होंने कृष्णनगर तथा तत्पश्चात जेसोर में कलेक्टर के रूप में कार्य किया। उनके पुत्र आनंदलाल राय जेसोर में अभिलेखाध्यक्ष (रिकॉर्ड कीपर) रहे। आनंदलाल के पुत्र श्री हरिश्चन्द्र राय एक दयालु, समाज-सुधारक तथा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के कुशल कर्मचारी थे, जिन्हें उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए प्रशंसा प्राप्त हुई। इसी प्रतिष्ठित परिवार में 2 अगस्त 1861 को रारुली ग्राम, जेसोर (अविभाजित बंगाल) में आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय का जन्म हुआ। वे हरिश्चन्द्र राय एवं भुवनमोहीनी देवी के तृतीय सन्तान थे। तीन भाइयों एवं दो बहनों वाले इस परिवार में उन्हें स्नेहपूर्वक ‘फुलु’ कहकर पुकारा जाता था।
शिक्षा:-
प्रफुल्ल की प्रारम्भिक शिक्षा 1866 से 1870 तक उनके दो बड़े भाइयों के साथ उनके पिता द्वारा संचालित विद्यालय में हुई। 1870 के अंत में वे कोलकाता गए और हेयर स्कूल में अध्ययन आरम्भ किया, परंतु पेचिश एवं अनिद्रा जैसी आवर्तक स्वास्थ्य समस्याओं के कारण वे स्वास्थ्य-लाभ हेतु पुनः अपने ग्राम लौट आए।। बाद में उन्होंने कोलकाता के अल्बर्ट स्कूल में प्रवेश लिया और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के बावजूद 1879 में मैट्रिकुलेशन परीक्षा उत्तीर्ण की। 18 वर्ष की आयु में प्रफुल्ल ने कॉलेज में प्रवेश किया और 1881 में रसायन विज्ञान में बी.ए. (B.A.) की उपाधि प्राप्त की। 1882 में उन्हें गिलक्रिस्ट छात्रवृत्ति प्राप्त हुई, जिसके अंतर्गत वे एडिनबर्ग विश्वविद्यालय (Edinburgh University) गए। वहाँ उन्होंने 1885 में रसायन विज्ञान में बी.एससी. (B.Sc.) तथा 1887 में डी.एससी. (D.Sc.) की उपाधि अर्जित की। इस अवधि में उन्हें होप पुरस्कार तथा फैराडे गोल्ड मैडल सहित अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए।
व्यावसायिक यात्रा:-
प्रफुल्ल चन्द्र राय ने 1889 में कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में सहायक प्राध्यापक (Assistant Professor) के रूप में अपने अध्यापन कार्य का आरम्भ किया और 1916 तक वहाँ कार्यरत रहे। इस अवधि में उन्होंने अनेक प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया, जिनमें प्रो. एस. एन. बोस और प्रो. मेघनाथ साहा जैसे विख्यात वैज्ञानिक सम्मिलित हैं। तत्पश्चात् सर अशुतोष मुखर्जी के अनुरोध पर उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय में पालित प्रोफेसर ऑफ केमिस्ट्री का पद ग्रहण किया और अपने जीवन के अंतिम समय तक वहीं से सम्बद्ध रहे। उनका शोधकार्य 1888 में कॉपर-मैग्नीशियम सल्फेट्स पर एक शोध-पत्र से प्रारम्भ हुआ और अपने जीवनकाल में उन्होंने 100 से अधिक शोध-प्रकाशन किए। 1895 में उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण खोज मरक्यूरस नाइट्राइट (Mercurous Nitrite) रही, जिसने उन्हें अकार्बनिक रसायन (Inorganic Chemistry) के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्रदान की। उनके प्रथम पी-एच.डी. शोधार्थी श्री जतीन्द्रनाथ सेन थे (1899)। प्रफुल्ल चन्द्र राय ने अपने शोध कार्य प्रस्तुत करने हेतु यूरोप की यात्रा भी की, जहाँ उन्होंने अनेक ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिकों से भेंट की।
लेखक एवं उद्यमी :- प्रफुल्ल चन्द्र राय केवल एक प्रख्यात वैज्ञानिक एवं शोधकर्ता ही नहीं, अपितु असाधारण लेखन-कौशल से सम्पन्न विद्वान भी थे। उन्होंने अनेक प्रभावशाली निबंधों एवं ग्रंथों की रचना की, जिनमें “India Before and After Mutiny”, “Problem of Scientific Education in India” तथा “History of Hindu Chemistry” (दो खंडों में, क्रमशः 1902 और 1909 में प्रकाशित) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उन्होंने मातृभाषा में वैज्ञानिक शिक्षा के महत्त्व पर बल दिया और 1906 में रसायन विज्ञान पर अपनी प्रथम पुस्तक बंगला भाषा में लिखी। 1907 में वे नेशनल एजुकेशन सोसाइटी के अध्यक्ष निर्वाचित हुए तथा ऐसे प्रकाशनों का संपादन किया, जिनमें आधुनिक रसायन विज्ञान और आयुर्वेद का समन्वय दृष्टिगोचर होता है। उनकी अंतिम कृति “आत्मचरिता” 1937 में प्रकाशित हुई। राय ने 1892 में बंगाल केमिकल वर्क्स की स्थापना की, जो 1901 में बंगाल केमिकल ऐंड फ़ार्मास्यूटिकल लिमिटेड के रूप में विकसित हुआ। इसका उद्देश्य बंगाल और भारत में औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित करना तथा उद्यमशीलता की भावना को बढ़ावा देना था। वे क्षेत्रीय औद्योगिक पुनर्जागरण के अग्रदूत के रूप में सदैव स्मरण किए जाते हैं।
परोपकार एवं राष्ट्रसेवा:- प्रफुल्ल चन्द्र राय एक समर्पित राष्ट्रवादी थे, जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन करते हुए क्रांतिकारियों को आश्रय एवं आहार प्रदान किया और इस प्रकार औपनिवेशिक शासन को चुनौती दी। ब्रिटिश प्रशासन ने उन्हें उनकी अप्रत्यक्ष भूमिका (विस्फोटक निर्माण में सहयोग) के कारण “वैज्ञानिक के वेश में क्रांतिकारी” की संज्ञा दी। राय ने 1924 में इंडियन केमिकल सोसाइटी तथा 1938 में इंडियन केमिकल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन की स्थापना की। वे महान परोपकारी थे, जिन्होंने 1923 में बंगाल में आई भीषण बाढ़ के समय व्यापक राहत कार्यों का आयोजन किया और बंगाल रिलीफ कमेटी की स्थापना की, जो बाद में बंगाल वॉलंटियर कॉर्प्स के रूप में विकसित हुई। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के रसायन विभाग को भी समृद्ध किया, जहाँ वे छात्रवृत्तियाँ प्रदान करते और वैज्ञानिक उपलब्धियों हेतु पुरस्कारों की स्थापना करते रहे। 16 जून 1944 को उनके निधन के समय हजारों छात्र उनके अंतिम संस्कार में सम्मिलित हुए, जो समाज और अकादमिक जगत पर उनके गहन प्रभाव का सजीव प्रमाण है।
आयुर्वेद एवं राय:- प्रफुल्ल चन्द्र राय प्राचीन उपचार पद्धतियों में गहरी रुचि रखते थे। 35 वर्ष की आयु में उन्होंने चरक और शुश्रुत जैसे ग्रंथों का अध्ययन किया और महत्वपूर्ण वैज्ञानिक एवं औषधीय दृष्टिकोणों को उजागर किया। उन्होंने प्राचीन विद्वानों के सम्मान में नागार्जुन पुरस्कार की स्थापना की और प्याज एवं लहसुन पर शोध कार्य भी किया। बंगाल में उन्होंने Bengal Chemical & Pharmaceutical Limited (BCPL) की स्थापना की, जहाँ से फैक्ट्री का पहला हर्बल उत्पाद निर्मित हुआ। प्राचीन रसायन विज्ञान के ज्ञान का पराकाष्ठा उन्होंने अपने द्विखंडीय ग्रंथ “History of Hindu Chemistry” में प्रदर्शित की। इसके अतिरिक्त, उन्होंने पंडित हरिश्चन्द्र काव्यरत्न के साथ रसायनशास्त्र पर आधारित ग्रंथ “रसार्णव” का संपादन किया, जो आयुर्वेद के प्रति उनकी गहन रुचि और निष्ठा को दर्शाता है। उनके शिष्यों में प्रो. (श्रीमती) असीमा चटर्जी प्रमुख थीं, जो भारतीय औषधीय पौधों के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित शोध वैज्ञानिक रही हैं और कलकत्ता स्थित CCRAS संस्थान (वर्तमान में केन्द्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पुरस्कार एवं सम्मानों:- प्रफुल्ल चन्द्र राय न केवल भारत में, बल्कि पश्चिमी जगत में भी अत्यंत प्रतिष्ठित व्यक्तित्व थे। उन्हें कई पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हुए, जिनमें पाँच मानद D.Sc. उपाधियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उन्हें Most Eminent Order of the Indian Empire से भी विभूषित किया गया। इसके अतिरिक्त, वे अनेक वैज्ञानिक संस्थाओं के फेलो रहे, जैसे कि एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल और केमिकल सोसाइटी। उनकी 150वीं जयंती पर The Royal Society of Chemistry द्वारा उन्हें Chemical Landmark Plaque से सम्मानित किया गया। राय ने कई प्रतिष्ठित पदों पर कार्य किया, जिनमें नेशनल एजुकेशन सोसाइटी के प्रमुख और इंडियन साइंस कांग्रेस एसोसिएशन के महासभा अध्यक्ष शामिल हैं। वे इंडियन केमिकल सोसाइटी के संस्थापक अध्यक्ष भी थे।
Full paper link
https://journals.lww.com/jras/fulltext/2024/08001/life_and_works_of_acharya_prafulla_chandra_ray__a.19.aspx

























































