
वैद्य आत्माराम वामन दात्र शास्त्री
जन्म तिथि :- 23rd 23 अप्रैल 1909
जन्म स्थान :- मुरुड, तालुका दापोली, जिला रत्नागिरी, महाराष्ट्र।
शैक्षिक योग्यताएँ :- उन्होंने 1915 से 1930 तक मराठी माध्यम से मुरुड में दसवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की। वे प्रसिद्ध वैद्य वेणिमाधव शास्त्री जोशी से आयुर्वेद सीखना चाहते थे, इसलिए उन्होंने प्रारंभ में “महाराष्ट्रीय आर्यांग्ल वैद्यक शाला, सातारा” में प्रवेश लिया। बाद में वे अपने गुरु का अनुसरण करते हुए अहमदनगर चले गए और वहाँ से 1933 में आयुर्वेदतीर्थ की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने 1938 में वाराणसी स्थित “निखिल भारत आयुर्वेद विद्यापीठ” से “आयुर्वेदाचार्य” की उच्चतम उपाधि प्राप्त की। उपाधि पूर्ण करने के बाद, दात्र शास्त्री ने 1938 में दादर (मुंबई) में चिकित्सकीय सेवा शुरू की और कुछ वर्षों बाद मुलुंड (बंबई) में एक और औषधालय की स्थापना की। मुंबई में अपनी सेवाएँ देने के पश्चात् उन्होंने 1983 में सांगली में स्थायी रूप से बसने का निर्णय लिया और वहीं शेष जीवन तक आयुर्वेद चिकित्सा का कार्य करते रहे।
व्यावसायिक यात्रा:-
वैद्य आत्माराम वामन दात्र शास्त्री ने पूरे भारत में पंचभौतिक चिकित्सा (Panchabhautik Chikitsa) के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाई। उनकी पहचान का तरीका अनूठा था — वे रोग के कारणों, प्रभावित अंगों तथा औषधीय द्रव्यों में विशेष पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश) की प्रधानता को पहचानते थे और इसी आधार पर उपयुक्त औषधियों का चयन करते थे। उन्होंने औषधीय पौधों को दो वर्गों में विभाजित किया — अम्ल (एसिडिक/खट्टा) और क्षारधर्मी (अल्कलाइन/क्षारीय प्रकृति)। इसके अतिरिक्त, उन्होंने एक नया सिद्धांत प्रस्तुत किया जिसके अनुसार व्यक्ति की प्रकृति (शारीरिक गठन और स्वभाव) का निर्धारण उसके जन्म के महीने के आधार पर किया जा सकता है। यह अवधारणा आयुर्वेद की पारंपरिक दृष्टि को वैज्ञानिक विश्लेषण से जोड़ती है और उपचार तथा आहार योजना को व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने में सहायक है। वैद्य दात्र शास्त्री ने पंचभौतिक चिकित्सा में निदान की प्रक्रिया को एक विशेष तकनीक के माध्यम से अपनाया, जिसे नाद परीक्षा (ध्वनि या परकशन द्वारा परीक्षण) कहा जाता है। इसके साथ ही उन्होंने पीड़न सहत्व (स्पर्श द्वारा जाँच / अंगों जैसे यकृत, गुर्दा आदि की कठोरता और मृदुता की जाँच) का उपयोग किया। यह विधि शरीर के अंगों की स्थिति और रोग की प्रकृति को समझने में सहायक होती है। वैद्य दात्र शास्त्री रोग की रोग-प्रक्रिया (पैथोफिजियोलॉजी) को समझते समय हमेशा षट्क्रियाकाल (रोग बनने की छह अवस्थाएँ) और अंशांश कल्पना (रोग की अवस्था को भागों में समझने की पद्धति) को ध्यान में रखते थे। ये सिद्धांत उन्हें रोग की उत्पत्ति और विकास को गहराई से समझने में मदद करते थे।
मुख्य योगदान:- पंचभौतिक चिकित्सा और प्रकृति से संबंधित सिद्धांतों के अतिरिक्त, वैद्य दात्र शास्त्री ने विशेष अनुपान (औषधि के साथ दिए जाने वाले सहायक पदार्थ) के प्रयोग और औषधि देने के समय पर भी विशेष ध्यान दिया। उन्होंने लोकपुरुष सम्य सिद्धांत (प्रकृति और मनुष्य की समानता) के आधार पर रोग में समान दिखने वाली औषधियों का चयन कर उपचार किया। इस प्रकार वे रोग के अनुरूप औषधि का निर्धारण कर चिकित्सा को अधिक प्रभावी बनाते थे। उदाहरण के लिए – वट (Ficus benghalensis) की वायवीय जड़ें वैरिकोज़ वेन्स (फूलीं हुई नसों) में उपयोग की जाती थीं। इसी प्रकार, जामुन (Syzygium Jambolanum) की तने की छाल का उपयोग गर्भाशय रक्तस्राव में किया जाता था, क्योंकि इसकी छाल का कॉर्टेक्स भाग गर्भाशय की मांसपेशियों जैसा दिखता है। औषधि की तैयारी के प्रति वे उतने ही समर्पित थे। उन्होंने वारण्गक क्षार (Varangak Kshara) की विशिष्ट तैयारी की विधि भी विकसित की।
प्रकाशन:- उन्होंने पंचभौतिक चिकित्सा पर अपनी पहली पुस्तक 1959 में लिखी। उन्होंने मराठी भाषा में कुल 6 पुस्तकें लिखी हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं – पंचभौतिक चिकित्सा भाग 1, पंचभौतिक चिकित्सा भाग 2, पंचभौतिक चिकित्सा और बालरोग, आयुर्वेद अंतर्गत हृद्रोग (आयुर्वेद में हृदय रोग), वनस्पतियों का स्वभाव अर्थात गुणधर्म शास्त्र (औषधीय पौधों के गुण, स्वभाव और औषधि निर्माण), गोवर-कंजीया (चिकनपॉक्स और खसरा) (चित्र 4। उनकी लिखी सभी पुस्तकें अब उनके ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित और बेची जाती हैं। उनके नाम से पंचभौतिक चिकित्सा पर लगभग 30 शोध पत्र लोकप्रिय आयुर्वेद पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं, जैसे –आयुर्वेद पत्रिका, मधुजीवन, आयुर्विद्या, निरामय और आरोग्यवर्धिनी। दात्र शास्त्री के कार्य को विभिन्न समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों के माध्यम से सराहा गया, जिनमें से कुछ हैं – धर्म भास्कर, स. विजयंत, डेली जनप्रवास, डेली केसरी, डेली सकाळ, डेली पुढारी।
पुरस्कार और सम्मान:- उनका साक्षात्कार 23 मार्च 1994 को रेडियो पर प्रसारित किया गया। फरवरी 1995 में उन्हें गुजरात आयुर्वेद विद्यापीठ, जामनगर में मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया। वैद्य दात्र शास्त्री रुग्ण सेवा प्रकल्प, इंडियन कॉम्प्लिमेंटरी थेरेपिस्ट्स एसोसिएशन, सांगली जिला मेडिकल एसोसिएशन और मुरुड शिक्षण मंडल के मानद सदस्य थे।उन्हें कई पुरस्कारों और सम्मान से नवाजा गया, जिनमें महाराष्ट्र आयुर्वेद महासम्मेलन, पुणे 1989 में सम्मान, प्रथम जागतिक आयुर्वेद सम्मेलन, पुणे 1991, आरोग्यवर्धिनी परिसंवाद, डोंबिवली 1993 तथा लोक स्वास्थ्य परंपरा – पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धतियों से संबंधित महाराष्ट्र राज्य सम्मेलन, मिरज 1993 शामिल हैं। उनकी अग्निसंस्था (पाचन अग्नि से संबंधित क्लिनिकल परीक्षण) तथा वरांगक क्षार, पद्मकिट्टा, विद्रुमकिट्टा जैसी औषधियों की तैयारी में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें 1995 में कोयंबटूर में आर्य वैद्य फार्मेसी द्वारा “बृहत्तरयीरत्न” (राष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च उपाधि) से सम्मानित किया गया।
वैद्यराज दात्र पंचमहाभूतिक चिकित्सा एवं शोध केंद्र:- 1 सितंबर 1988 को उन्होंने सांगली में वैद्यराज दात्र पंचमहाभूतिक चिकित्सा एवं शोध केंद्र की स्थापना की। 25 दिसंबर 1995 को उनके दुखद निधन के बाद, त 3 मई 1998 को वैद्य मधुसूदन शास्त्री द्वारा एक नए भवन का उद्घाटन किया गया। आज उनके शिष्य उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं । वैद्य अशोक वाली और वैद्य अनिरुद्ध कुलकर्णी वर्तमान में इस ट्रस्ट में क्रमशः अध्यक्ष और सचिव के रूप में कार्यरत हैं। ट्रस्ट की प्रमुख गतिविधियों में “वैद्यराज ए.डब्ल्यू. दात्र शास्त्री आयुर्वेद चिकित्सा मंदिर” शामिल है, जहाँ प्रामाणिक और वैज्ञानिक पंचमहाभूत तथा पंचकर्म चिकित्सा प्रदान की जाती है। इसके साथ ही वैद्य दात्र शास्त्री द्वारा लिखित पुस्तकों के साथ विभिन्न वैज्ञानिक ग्रंथों का प्रकाशन भी किया जाता है। वैद्य दात्र शास्त्री द्वारा तैयार की गई औषधियों का निर्माण और वितरण किया जाता है। यह ट्रस्ट बी.ए.एम.एस. विद्यार्थियों के लिए व्याख्यानों तथा चिकित्सा शिविरों का आयोजन भी करता है। अब तक इस संस्थान ने लगभग 20 राज्य स्तरीय और 2 राष्ट्रीय स्तर के सेमिनार एवं सम्मेलन आयोजित किए हैं। सन् 2000 से प्रत्येक वर्ष जन्माष्टमी के अवसर पर प्रसिद्ध वैद्य और आयुर्वेद के विद्यार्थियों को क्रमशः “वैद्यराज ए. डब्ल्यू. दात्रशास्त्री स्मृति पुरस्कार” तथा छात्रवृत्तियाँ प्रदान की जाती हैं। जून 2015 से पंचभूतिक ट्रस्ट ने पंचभूतिक चिकित्सा में 6 महीने का ऑनलाइन डिप्लोमा कोर्स शुरू किया है। वहीं, 23 अप्रैल 2009 को वैद्य दात्र शास्त्री की जन्मशती के अवसर पर वेबसाइट https://datarpanchabhautik.org/ का शुभारंभ किया गया, जहाँ विद्यार्थी ट्रस्ट द्वारा संचालित पाठ्यक्रमों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा, औषधियाँ और पुस्तकें विक्रय के लिए उपलब्ध हैं।

























































