वैद्यभूषणम के. राघवन तिरुमुलपाडु

जन्म तिथि :-  20 मई 1920 (मलयालम कैलेंडर अनुसार 6 इदवम 1095)

जन्म स्थान :-  चिंगोली, अलप्पुझा जिला, केरल

परिवार पृष्ठभूमि: वैद्यभूषणम के. राघवन तिरुमुलपाडु का जन्म श्री डी. नारायण अय्यर और श्रीमती के. लक्ष्मीकुट्टी नम्बिष्ठातिरी के यहाँ हुआ। उनके परिवार में कोई पारंपरिक आयुर्वेदिक विरासत नहीं थी। उन्होंने श्रीमती विशालाक्षी थम्पुरट्टी से विवाह किया। उनके पुत्र डॉ. के. मुरली सरकारी आयुर्वेद कॉलेज, त्रिपुनिथुरा में कायचिकित्सा (आंतरिक चिकित्सा) के सेवानिवृत्त प्रोफेसर रहे। उनके द्वारा आरंभ की गई पारिवारिक परंपरा आज तीन पीढ़ियों तक जारी है।

शैक्षणिक योग्यता: After completing Class Xth उन्होंने 1937 में चालक्कुड़ी बॉयज़ हाई स्कूल, त्रिशूर से कक्षा दसवीं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्हें संस्कृत, ज्योतिष और तर्क जैसे समसामयिक विषयों में प्रशिक्षण मिला, लेकिन कुछ परिस्थितियों के कारण वे इसे पूरा नहीं कर सके। बाद में उन्हें पल्लिप्पुरट्टु वासुदेवन नाम्बिसान से आयुर्वेद में प्रशिक्षण मिला और उन्होंने 1949 में कोच्चि सरकार से वैद्यभूषणम डिग्री परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। साथ ही उन्होंने भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान, मुंबई से प्राकृतिक चिकित्सा (नेचुरोपैथी) में प्रथम श्रेणी प्राप्त की।

व्यावसायिक यात्रा:-

आयुर्वेदिक स्वास्थ्य सेवा में प्रमुख व्यक्तित्व: वह समाना चिकित्सा (Samana Chikitsa) के सक्रिय प्रवक्ता थे और पथ्य (आहार, जीवनशैली और व्यवहार संबंधी नियमों) का पालन करने की आवश्यकता पर बल देते थे। वी. के. आर. टी. चालक्कुड़ी में आयुर्वेद मण्डल के अध्यक्ष रहे और उन्होंने चालक्कुड़ी में ए. एम. पी. आई. सी. (Ayurvedic Medical Practitioners Industrial Co-operative Pharmacy – आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रैक्टिशनर्स औद्योगिक सहकारी फार्मेसी) की स्थापना की, जो वास्तविक आयुर्वेदिक औषधियों की कमी से निपटने के लिए प्रभावी रूप से कार्य कर रही है।

शैक्षणिक सुधार:  एम.जी. विश्वविद्यालय, कोट्टायम; कैलिकट विश्वविद्यालय; केरल विश्वविद्यालय और कन्नूर विश्वविद्यालय के बोर्ड ऑफ स्टडीज़ के सदस्य के रूप में, श्री शंकर विश्वविद्यालय, कालाड़ी के सिंडिकेट तथा शैक्षणिक सलाहकार के रूप में, केरल और कन्नूर विश्वविद्यालयों के आयुर्वेद संकाय से जुड़े होकर, कोयम्बटूर स्थित आयुर्वेद ट्रस्ट के सदस्य तथा विभिन्न कार्यकालों में केरल सरकार की आयुर्वेद सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में सेवा देते हुए, वैद्यभूषणम् के. राघवन तिरुमुलपाडु (VKRT) ने आयुर्वेद पाठ्यक्रम के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वैद्यभूषणम् के. राघवन तिरुमुलपाडु फाउंडेशन (VKRTF), जो आयुर्वेद के अनौपचारिक और समग्र प्रशिक्षण के लिए स्थापित किया गया है, सैकड़ों आयुर्वेद शिक्षार्थियों को समग्र और साक्ष्य-आधारित शिक्षा प्रदान करने में निरंतर योगदान दे रहा है। पद्मविभूषण डॉ. एम. एस. वलियाथन ने होमी भाभा फेलोशिप के अंतर्गत चरक संहिता के अपने अध्ययन में VKRT के मार्गदर्शन को विशेष रूप से सराहा।

सफल लेखक और दार्शनिक:- वैद्यभूषणम् के. राघवन तिरुमुलपाडु (VKRT) ने आयुर्वेद पर विशेष रूप से 35 से अधिक पुस्तकें लिखीं। प्राकृतिक चिकित्सा (नैचुरोपैथी) में मलयालम की पहली पाठ्यपुस्तक उनकी महत्वपूर्ण देन थी। आयुर्वेदिक ग्रंथों के अतिरिक्त, उन्होंने संस्कृत और मलयालम में कविता और श्लोक, तमिल और संस्कृत पुस्तकों के अनुवाद, तथा स्वास्थ्य, कला, संस्कृति, धर्म, राजनीति, दर्शन और साहित्य से संबंधित पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में लेख लिखे। उनकी यह समृद्ध साहित्यिक उपलब्धि उन्हें एक प्रतिष्ठित विचारक और लेखक के रूप में स्थापित करती है।

प्रसिद्ध समाज सुधारक और पर्यावरण प्रेमी:- वैद्यभूषणम् के. राघवन तिरुमुलपाडु (VKRT) महात्मा गांधी और श्री नारायण गुरु से गहराई से प्रभावित थे। ट्रस्टीशिप और सर्वोदया आंदोलन जैसे गांधीवादी आदर्शों ने उनके दृष्टिकोण को आकार दिया। वे सांस्कृतिक, धार्मिक और वैज्ञानिक सम्मेलनों में प्रभावशाली वक्ता थे और मदिरा सेवन, नदी संरक्षण आदि से जुड़े मुद्दों पर अपने विचार रखते थे। वे चालक्कुडी नदी संरक्षण समिति के संरक्षक भी रहे और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सक्रिय योगदान दिया।

साहित्यिक योगदान:-

  • भगवद गीता – अनुवाद (प्रथम संस्करण – 1954)
  • प्रकृति चिकित्सा (प्रथम संस्करण – 1957)
  • बुद्ध धर्म – धर्मपद का मलयालम अनुवाद (प्रथम संस्करण – 1958)
  • देवी महात्म्य – संस्कृत स्तोत्र का मलयालम अनुवाद (प्रथम संस्करण – 1960) Sanskrit Stotra (First edition – 1960)
  • इसम और महात्मा – गांधी दर्शन पर आधारित (प्रथम संस्करण – 1961)
  • तिरुक्कुरल – मलयालम अनुवाद (प्रथम संस्करण – 2003)
  • क्रियाक्रमम् – केरलीय आयुर्वेदिक उपचार प्रक्रियाएँ
  • राघवीय – श्रीराम पर आधारित संस्कृत काव्य (प्रथम संस्करण – 1972) Sanskrit Kavya about Srirama (First edition – 1972)
  • हृद्रोग – प्रथम संस्करण – 1973
  • आयुर्वेद परिचय (प्रथम संस्करण – 1976) – द्वितीय संस्करण ‘आरोग्य दर्शन’
  • तंत्रयुक्तिविवेक – तंत्रयुक्ति विचार पर टिप्पणी (प्रथम संस्करण – 1976)
  • रसवैशेषिक व्याख्या – रसवैशेषिक सूत्र पर टिप्पणी (प्रथम संस्करण – 1977)
  • मुखक्कन्नाडी – आत्मकथा (प्रथम संस्करण – 1982)
  • विवृतिव्याख्या – अष्टांग हृदय के मूल सिद्धांतों पर टिप्पणी (प्रथम संस्करण – 1982)
  • आयुर्वेद दर्शन – (प्रथम संस्करण – 1983)
  • कुष्ठरोग और इलाज – (प्रथम संस्करण – 1988)
  • संपूर्ण आरोग्य संरक्षण – (प्रथम संस्करण – 1989)
  • आयुर्वेदम् – आरोग्यशास्त्रम् (प्रथम संस्करण – 1992)
  • अष्टांग दर्शनम् – (प्रथम संस्करण – 1998)
  • भैषज्य दर्शनम् – (प्रथम संस्करण – 2002)
  • पार्श्वविक्षणंगल – (प्रथम संस्करण – 2003)
  • नम्मुडे आरोग्यम् – (प्रथम संस्करण – 2003)
  • एन्ते गुरु दर्शनम् – श्री नारायण गुरु पर आधारित (प्रथम संस्करण – 2003)
  • आयुर्वेदथिलुडे – (प्रथम संस्करण – 2007)
  • आयुर्वेदम् एक अवलोकनम् – (प्रथम संस्करण – 2007)
  • प्रकाशिका व्याख्या – अष्टांग संहिता पर 12 खंडों में (1981–1987 के दौरान)
  • मूल सिद्धांत
  • स्वास्थवृत्त
  • द्रव्यार्थ विज्ञान
  • शरीर
  • शल्यतंत्र
  • कर्म परिचय
  • निदानस्थान
  • ग्रह और बालग्रह चिकित्सा
  • चिकित्सितम् 1
  • चिकित्सितम् 2
  • विषम, रसायनम्, वाजीकरणम्
  • ऊर्ध्वांग चिकित्सा
  • रसवैशेषिक (प्रथम संस्करण – 2010)
  • चिकित्सा प्रकाश (प्रथम संस्करण – 2010)
  • ग्लिम्प्सेस ऑफ आयुर्वेद (प्रथम संस्करण – 2010)
  • दीर्घ जीवन (प्रथम संस्करण – 2010)
  • विचारधारा – भाग 1 (प्रथम संस्करण – 2005)
  • विचारधारा – भाग 2 (प्रथम संस्करण – 2007)
  • अपस्मारवुम् चिकित्सा युम् (प्रथम संस्करण – 1975)
  • पंचकर्म (प्रथम संस्करण – 1967)
  • हृद्रोगवुम् चिकित्सा युम् (प्रथम संस्करण – 2013)
  • रसायन वाजीकरण चिकित्सा काल (प्रथम संस्करण – 1975)
  • कुष्ठरोगवुम् चिकित्सा युम् (प्रथम संस्करण – 1969)
  • आरोग्य संरक्षणम् आयुर्वेदतिल् (प्रथम संस्करण – 2019)

वे वैद्य विज्ञान कोश जैसे अनेक ग्रंथों के संपादक रहे। इसके अलावा उन्होंने गुरुगिता, आयुर्वेद कौतुक आदि पुस्तकें भी लिखी थीं। उनके अनेक कार्य अभी प्रकाशित नहीं हो सके हैं, जैसे अष्टांगहृदय के प्रथम अध्याय और चरक संहिता की टीकाएँ। वे मातृभूमि आरोग्यमासिक, देशबंधु, नाट्टुवैद्यं, आरोग्यम आदि लोकप्रिय स्वास्थ्य पत्रिकाओं में स्तंभकार (कॉलम लेखक) भी रहे

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https://journals.lww.com/jras/fulltext/2024/08002/life_profile_of_vaidyabhooshanam_k__raghavan.24.aspx
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