प्रोफेसर नम्बुरी हनुमंता राव
जन्म तिथि :- 5 अक्टूबर 1919
जन्म स्थान :- विजयवाड़ा, कृष्णा जिला, आंध्र प्रदेश
परिवार का विवरण :- प्रोफेसर नम्बुरी हनुमंता राव का जन्म एक व्यवसायी परिवार में हुआ। उनके पिता श्री नम्बुरी वेणुगोपाल राव एक चावल मिल के मालिक थे, जबकि उनकी माता श्रीमती नम्बुरी महालक्ष्मम्मा गृहिणी थीं। उन्होंने श्रीमती नम्बुरी सीतारावम्मा से विवाह किया और उनके तीन पुत्र तथा पाँच पुत्रियाँ थीं। उनके एक पुत्र डॉ. नम्बुरी भास्कर वेणुगोपाल राव न भरने वाले अल्सर (घाव) के उपचार में विशेषज्ञ हैं, जबकि दूसरे पुत्र डॉ. नम्बुरी श्यामल राव विजयवाड़ा में पंचकर्म थेरेपी सेंटर का संचालन करते हैं।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा:
प्रो. राव ने वर्ष 1937 में विजयवाड़ा स्थित एस.के.पी.वी.वी. हिन्दू हाई स्कूल से उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी की। तत्पश्चात उन्होंने वर्ष 1942 में मद्रास स्थित स्कूल ऑफ़ इंडियन मेडिसिन से एल.आई.एम. डिप्लोमा प्राप्त किया। अपनी प्रारंभिक सेवाएँ उन्होंने विजयवाड़ा के श्री चुंडुरी वेंकट रेड्डी आयुर्वेदिक चैरिटी क्लिनिक में दीं, जहाँ उन्होंने जीर्ण रोगों के उपचार में ख्याति अर्जित की।
व्यावसायिक यात्रा
आयुर्वेद और रसशास्त्र में नवाचार:
- नम्बुरी फेज़्ड स्पॉट टेस्ट (NPST): भस्म और सिंदूर जैसे हर्बो-खनिज योगों की गुणवत्ता निर्धारण के लिए एक गुणात्मक मानकीकरण तकनीक। इसका शोध कार्य 1991 में प्रकाशित हुआ और 2010 में संशोधित किया गया।
- रसौषधियों के लिए विशेष यंत्रों का विकास: नम्बुरी कच्चा कुपी, नम्बुरी जरणा यंत्र, तथा नम्बुरी क्लोज़्ड वलुका तिर्यक पथन यंत्र जैसे उपकरणों का निर्माण कर औषध निर्माण प्रक्रिया में दक्षता और सटीकता बढ़ाई।
- आयुर्वेदिक योगों के संरक्षण में नवाचार: विष, विषहरत्व और अनुपान की अवधारणाओं में नए आयामों की पहचान कर आयुर्वेदिक औषध निर्माण व संरक्षण को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।
अनुसंधान एवं शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना:
- द अकादमी ऑफ आयुर्वेद, विजयवाड़ा (1961): स्थापित कर 500 से अधिक मासिक क्लिनिकल व्याख्यान आयोजित किए।
- योग समाज (1963): योग के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से संस्था की स्थापना की।
- मुख्य अन्वेषक (1972–1991): स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन केंद्रीय आयुष अनुसंधान परिषद (CCRAS) में दवा मानकीकरण अनुसंधान परियोजना का नेतृत्व किया।
आयुर्वेद शिक्षा और अनुसंधान में योगदान:
- बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, नागार्जुन विश्वविद्यालय तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में अतिथि व्याख्यान दिए।
- पंचमहाभूत सिद्धांत पर शोध कर इसे अणु विज्ञान तथा आधुनिक बिग बैंग थ्योरी से जोड़ा।
- प्रमुख प्रकाशन: मैनुअल ऑफ NPST, पंचभूत थ्योरी: ए वायबल कॉन्सेप्ट, न्याय वैशेषिक थ्योरी ऑफ इवोल्यूशन
- डॉ. राव’स हर्बल फार्मा प्राइवेट लिमिटेड (1987) की स्थापना की, जहाँ मधुमेह, गठिया और बालों की देखभाल से संबंधित आयुर्वेदिक औषधियों का निर्माण किया जाता है।
सम्मान और पुरस्कार:
- प्रो. राव को अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा गया, जिनमें शामिल हैं:
- बृहत्रयी रत्न पुरस्कार (1994): भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त श्री टी.एन. सेशन द्वारा प्रदान किया गया।
- फेलोशिप – नेशनल एकेडमी ऑफ इंडियन मेडिसिन (1990): भारतीय चिकित्सा क्षेत्र में उनके योगदान के लिए मान्यता।
- फेलोशिप – राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ, दिल्ली (1995): आयुर्वेद शिक्षा और अनुसंधान में उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मान।
सामाजिक और वैश्विक सहभागिता:
- केंद्रीय आयुर्वेदिक चिकित्सा बोर्ड, भारत सरकार (1967): सदस्य के रूप में कार्य किया।
- राष्ट्रीय चिकित्सा सप्ताह एवं निःशुल्क आयुर्वेदिक शिविर: भारत में राष्ट्रीय चिकित्सा सप्ताह समारोहों का आयोजन तथा मुफ्त आयुर्वेदिक चिकित्सा शिविर चलाए।
- उत्तरी अमेरिका और फिलीपींस में आयुर्वेद आधारित रोग निवारण कार्यक्रम आयोजित किए।
- भारत में राष्ट्रीय चिकित्सा सप्ताह समारोह और निःशुल्क आयुर्वेदिक शिविरों का आयोजन किया गया।
सिद्धांत और आदर्श :-
प्रो. राव को आयुर्वेद के वैज्ञानिक दृष्टिकोण, औषधि शोध में अग्रणी योगदान तथा आयुर्वेद को वैश्विक स्तर पर प्रचारित करने की प्रतिबद्धता के लिए जाना जाता था। उनकी जीवन-दृष्टि में सतत अध्ययन, अंतःविषयी सहयोग, तथा आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान के समन्वय पर विशेष बल दिया गया।
विरासत और प्रभाव :-
प्रोफेसर नम्बुरी हनुमंता राव का निधन 2006 में हुआ। उन्होंने रसशास्त्र, आयुर्वेद अनुसंधान और औषधि मानकीकरण के क्षेत्र में नवाचार की समृद्ध विरासत छोड़ी। उनकी उपलब्धियाँ आज भी आयुर्वेद के शोधकर्ताओं, शिक्षकों और चिकित्सकों को प्रेरित कर रही हैं और वैश्विक स्तर पर आयुर्वेद के विकास में योगदान दे रही हैं।



























































