कविराज गंगाधर रॉय
जन्म तिथि :- 1798
जन्म स्थान::- यशोरा/मद्रा ज़िले के जेस्सोर गाँव (वर्तमान में बांग्लादेश का हिस्सा)
व्यक्तिगत एवं पारिवारिक विवरण:- कविराज गंगाधर रॉय का जन्म 1798 में जेस्सोर गाँव, यशोरा/मद्रा ज़िले (वर्तमान बांग्लादेश) में हुआ। उन्हें आयुर्वेद के गौरवशाली व्यक्तित्वों में गिना जाता है (1798–1885)। वे भवानी प्रसाद रॉय और अभया देवी के पुत्र थे और उन्होंने आयुर्वेद की शिक्षा अपने दादा से प्राप्त की।
आयुर्वेद का पुनर्जागरण – विद्वत्तापूर्ण प्रभाव:-कविराज गंगाधर रॉय की चरक संहिता तथा मधुसूदन गुप्ता की सुश्रुत संहिता की कृतियों ने भारतीय वैद्य, विद्वानों और प्रकाशकों द्वारा आयुर्वेदिक ग्रंथों के संपादन, अनुवाद, व्याख्या और मुद्रण की एक सुनियोजित परंपरा का सूत्रपात किया। “कबिराज” की उपाधि ऐतिहासिक रूप से पूर्वी भारत में आयुर्वेदाचार्यों को दी जाती थी। जो राजदरबारों में चिकित्सक होते थे, उन्हें “कबिराज” (अर्थात “राजकवि” – अन्यत्र प्रयुक्त राजवैद्य की तरह) कहा जाता था। बाद में इन चिकित्सकों के वंशजों ने इसे उपनाम के रूप में अपनाया। इस आंदोलन ने चरक संहिता के पुनर्जागरण में योगदान दिया और भारतीय वैद्यों व विद्वानों में अपनी सांस्कृतिक धरोहर के प्रति जागरूकता को मजबूत किया। गंगाधर रॉय के कार्य का प्रभाव इतना गहरा था कि उन्नीसवीं शताब्दी को आयुर्वेद के इतिहास में “गंगाधर युग” कहा जाता है।
जल्पकल्पतरु – चरक संहिता पर गंगाधर रॉय की नवोन्मेषी टीका:- कविराज गंगाधर रॉय मुर्शिदाबाद आ गए, जहाँ उन्होंने अपनी चिकित्सा-सेवा प्रारम्भ की और आयुर्वेद का शिक्षण भी दिया। उनके प्रयासों से मुर्शिदाबाद आयुर्वेदिक शिक्षा का प्रमुख केंद्र बन गया। उन्होंने गंगाधर निकेतन चतुष्पाठी की स्थापना की, जो भावी वैद्यों को प्रशिक्षण देने के लिए समर्पित था। विद्वत्ता की मान्यता में उस समय की सरकार ने उन्हें वैद्यरत्न की उपाधि प्रदान की। उनके नेतृत्व में यह संस्थान शीघ्र ही क्षेत्र के श्रेष्ठ आयुर्वेदाचार्यों को तैयार करने के लिए प्रसिद्ध हो गया। उन्होंने व्यावहारिक प्रशिक्षण और प्रत्यक्ष अनुभव पर विशेष बल दिया तथा एक कठोर और समग्र पाठ्यक्रम तैयार किया, जिससे विद्यार्थियों को आयुर्वेद में दक्षता प्राप्त करने हेतु आवश्यक ज्ञान और कौशल मिल सके। परिणामस्वरूप, यह संस्थान आयुर्वेद सीखने के इच्छुक छात्रों के लिए अत्यंत आकर्षक गंतव्य बन गया।
आयुर्वेद में मुद्रण क्रांति:- आचार्य गंगाधर रॉय ने उन्नीसवीं शताब्दी के बंगाल में आयुर्वेद को परिवर्तित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, विशेषकर इसे मुद्रण से जोड़कर। उन्होंने मुद्रक-प्रकाशक भुवन चंद्र वसाका के साथ मिलकर कार्य किया। उनकी चरक संहिता की संस्करण और उस पर लिखी टीका जल्पकल्पतरु ने आयुर्वेदिक ज्ञान को पांडुलिपियों से मुद्रित ग्रंथों तक पहुँचाया और इसे व्यापक रूप से सुलभ बना दिया। इतिहासकार प्रोजित मुखर्जी के अनुसार, बैद्य-बुर्जुआ वर्ग ने परंपरागत ज्ञान और औपनिवेशिक पाश्चात्य चिकित्सा के बीच सेतु का कार्य किया। गंगाधर रॉय के पुत्र, धरनीधर रॉय ने इस धरोहर को आगे बढ़ाते हुए 1878–1880 में सैदाबाद के प्रमाद भंजन प्रेस से बंगला लिपि में संस्करण प्रकाशित किया। बंगाल लाइब्रेरी ने इसे 30 जून, 1879 को दर्ज किया। उनके पौत्र त्र्यम्बकेश्वर रॉय ने 1908 में संशोधित संस्करण प्रकाशित किया। बाद में नरेन्द्रनाथ सेनगुप्ता और बलाइचंद्र सेनगुप्ता ने 1928 और 1933 में धन्वंतरि प्रेस से अन्य संस्करण प्रकाशित किए। मधुसूदन गुप्ता द्वारा 1836 में किए गए विच्छेदन के बाद गंगाधर रॉय का कलकत्ता छोड़कर सैदाबाद जाना, औपनिवेशिक हस्तक्षेपों के विरुद्ध उनके प्रतिरोध का प्रतीक माना जाता है। सरस्वती भवन पुस्तकालय की पांडुलिपि संख्या 108824 तथा 1840–41 की MS.150 उनकी सूक्ष्म विद्वत्ता और आयुर्वेद को संरक्षित करने के उनके संकल्प का प्रमाण हैं। वसाका के संवाद ज्ञानरत्नाकर प्रेस और प्रमाद भंजन प्रेस के प्रयासों ने आयुर्वेद को आधुनिकता से जोड़ते हुए औपनिवेशिक काल में भी इसकी प्रासंगिकता बनाए रखी।
आयुर्वेद और अन्य क्षेत्रों में गंगाधर रॉय का व्यापक योगदान:- चरक संहिता पर टीका के अतिरिक्त, कविराज गंगाधर रॉय ने आयुर्वेद से संबंधित अनेक विषयों पर ग्रंथ लिखे, जैसे – परिभाषा, भैषज्य रामायण, अग्नेयायुर्वेद व्याख्या, नाड़ी परीक्षा इत्यादि। उनकी कृतियों ने आयुर्वेदिक ज्ञान का विस्तार किया और इसे वैद्यों व रोगियों तक अधिक सुलभ बनाया। उन्होंने पथ्यापथ्य, भास्करोदय (रोगविज्ञान पर), वैद्यतत्त्वविनिश्चय की भी रचना की। आयुर्वेद ही नहीं, बल्कि उन्होंने संस्कृत साहित्य के विविध पक्षों – साहित्य, व्याकरण और दर्शन – पर भी लगभग 76 पुस्तकों की रचना की। किंतु उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान था परंपरागत आयुर्वेदिक अध्ययन का पुनर्जागरण और संवर्धन, जिसे मुग़ल काल में लगभग उपेक्षित कर दिया गया था।
| आयुर्वेद पर पुस्तकें | अन्य विषयों पर पुस्तकें |
| ‘‘परिभाषा’‘ | |
| ‘भैषज्य रामायण’‘ | तत्त्वविद्याकर |
| ‘अग्नेयायुर्वेद व्याख्या’‘ | मुग्धबोधमाहावृत्ति |
| ‘‘नाड़ी परीक्षा’‘ | तैत्तिरीयोपनिषद् वृत्ति |
| ‘राजवल्लभीय द्रव्यगुणविवृति’‘ | काव्यप्रभा |
| ‘भास्करोदय’ | लोकालोकपुरुषीय |
| ‘मृत्युंजय संहिता’‘ | राजविजय |
| ‘‘आरोग्य स्तोत्रम्’ | तारावतीस्वयंग्व |
| ‘प्रयोग चन्द्रोदय’‘ | प्रमादभवजनी |
| ‘आयुर्वेद संग्रह’‘ |


























































