महाकवि श्री कृष्णराम भट्ट

जन्म तिथि :- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, 1849
जन्म स्थान::- जयपुर, राजस्थान
व्यक्तिगत एवं पारिवारिक विवरण:- कुंदन राम भट्ट और रेवाबा के सुपुत्र, कृष्णराम भट्ट को आयुर्वेद की वह विरासत प्राप्त हुई जिसकी नींव उनके परदादा श्री लक्ष्मी राम व्यास ने रखी थी, जिन्हें राजवैद्य की उपाधि प्राप्त थी। इस परंपरा को उनके दादा श्री उदयराम भट्ट और पिता कुंदन राम भट्ट ने और समृद्ध किया। यह परंपरा आगे भी चली और उनके पौत्र श्री रंचोड़ कालाधर भट्ट तथा प्रपौत्र प्रो. श्री देवेंद्र भट्ट (1925-2011) तक पहुँची।

साहित्यिक योगदान (आयुर्वेद)

विद्वाद-वैद्य-तरंगिणी:- यह नौ अध्यायों का ग्रंथ है जिसमें ग्यारह रोगों का वर्णन है और उनके उपचार हेतु शास्त्रीय सन्दर्भों से लिए गए वनस्पति-आधारित योग प्रस्तुत किए गए हैं।

सिद्ध-भेषजमणिमाला:- उनका सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ, जिसमें उनके व्यावहारिक अनुभव, पारिवारिक परंपरा और अन्य वैद्यों के योगदान समाहित हैं। यह 1901 से 1948 तक आयुर्वेद की पाठ्यपुस्तक रही।

पलन्दुराजा-शतकम्:- यह अद्वितीय काव्य है जिसमें प्याज़ और लहसुन की औषधीय गुणों का वर्णन है, विशेषकर हैजा और पीलिया जैसे रोगों के उपचार में।

साहित्यिक योगदान (अन्य रचनाएँ)

कच्छवंश महाकाव्य:- संस्कृत में रचित एक महाकाव्य, जिसमें जयपुर के शासकों की वंशावली के साथ ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक पक्षों का भी चित्रण है।

मुक्तक-मुक्तावली, सारशतकम्, जयपुर-विलास, और होलमहोत्सव:- इन कृतियों में उनकी विविधता दृष्टिगोचर होती है—पहेलियों और ऋतु-चित्रण से लेकर जयपुर के नगर जीवन और लोक परंपराओं तक।

विरासत और निधन:- अत्यंत व्यापक योगदानों के बावजूद, कृष्णराम भट्ट का जीवन मात्र 49 वर्ष की आयु में उदररोग के कारण समाप्त हो गया। उनकी आयुर्वेद और साहित्य के प्रति निष्ठा उनकी वंश परंपरा में जीवित रही, जिसने उनके ज्ञान को आगे बढ़ाया।

प्रशंसा:- आयुर्वेद और साहित्य में उनके असाधारण योगदान के कारण उन्हें महाभाग (अत्यंत विशिष्ट) और महाकवि की उपाधि प्राप्त हुई।

 

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