महाकवि श्री कृष्णराम भट्ट
जन्म तिथि :- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, 1849
जन्म स्थान::- जयपुर, राजस्थान
व्यक्तिगत एवं पारिवारिक विवरण:- कुंदन राम भट्ट और रेवाबा के सुपुत्र, कृष्णराम भट्ट को आयुर्वेद की वह विरासत प्राप्त हुई जिसकी नींव उनके परदादा श्री लक्ष्मी राम व्यास ने रखी थी, जिन्हें राजवैद्य की उपाधि प्राप्त थी। इस परंपरा को उनके दादा श्री उदयराम भट्ट और पिता कुंदन राम भट्ट ने और समृद्ध किया। यह परंपरा आगे भी चली और उनके पौत्र श्री रंचोड़ कालाधर भट्ट तथा प्रपौत्र प्रो. श्री देवेंद्र भट्ट (1925-2011) तक पहुँची।
शैक्षिक योग्यताएँ :-
पिता और दादा के मार्गदर्शन में कृष्णराम भट्ट ने आयुर्वेद, संस्कृत साहित्य, न्याय और व्याकरण में गहन अध्ययन किया। उन्होंने प्रख्यात आचार्यों से शिक्षा प्राप्त की—श्री जीवननाथ गुरु से काव्यप्रकाश तथा श्री चंदन जी से छंद शास्त्र का अध्ययन किया। आयुर्वेद और साहित्य में वे बहुविद्याविद् के रूप में प्रतिष्ठित हुए। उनकी गहन बुद्धि और अध्ययन के प्रति समर्पण ने चिकित्सा विज्ञान और शास्त्रीय साहित्य—दोनों में उनके महत्वपूर्ण योगदान की नींव रखी।
व्यावसायिक यात्रा:-
शैक्षणिक योगदान:- 27 वर्ष की आयु में उन्होंने जयपुर की राजकीय संस्कृत पाठशाला में अध्यापन कार्य प्रारंभ किया। 22 वर्षों तक उन्होंने आयुर्वेद शिक्षा को दिशा दी और अनेक प्रसिद्ध वैद्यों का निर्माण किया। उन्होंने केवल आयुर्वेद ही नहीं, बल्कि काव्यप्रकाश और साहित्यदर्पण भी पढ़ाया और अपने समय की बौद्धिक धारा को समृद्ध किया। उनका प्रख्यात ग्रंथ सिद्ध-भेषजमणिमाला आज भी आयुर्वेद शिक्षा का आधारभूत ग्रंथ माना जाता है।
नेतृत्व भूमिका:- उन्होंने जयपुर के माधव विलास महल स्थित राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय के प्राचार्य के रूप में कार्य किया और आयुर्वेद की शैक्षणिक संरचना तथा पद्धतियों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
साहित्यिक योगदान (आयुर्वेद)
विद्वाद-वैद्य-तरंगिणी:- यह नौ अध्यायों का ग्रंथ है जिसमें ग्यारह रोगों का वर्णन है और उनके उपचार हेतु शास्त्रीय सन्दर्भों से लिए गए वनस्पति-आधारित योग प्रस्तुत किए गए हैं।
सिद्ध-भेषजमणिमाला:- उनका सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ, जिसमें उनके व्यावहारिक अनुभव, पारिवारिक परंपरा और अन्य वैद्यों के योगदान समाहित हैं। यह 1901 से 1948 तक आयुर्वेद की पाठ्यपुस्तक रही।
पलन्दुराजा-शतकम्:- यह अद्वितीय काव्य है जिसमें प्याज़ और लहसुन की औषधीय गुणों का वर्णन है, विशेषकर हैजा और पीलिया जैसे रोगों के उपचार में।
साहित्यिक योगदान (अन्य रचनाएँ)
कच्छवंश महाकाव्य:- संस्कृत में रचित एक महाकाव्य, जिसमें जयपुर के शासकों की वंशावली के साथ ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक पक्षों का भी चित्रण है।
मुक्तक-मुक्तावली, सारशतकम्, जयपुर-विलास, और होलमहोत्सव:- इन कृतियों में उनकी विविधता दृष्टिगोचर होती है—पहेलियों और ऋतु-चित्रण से लेकर जयपुर के नगर जीवन और लोक परंपराओं तक।
विरासत और निधन:- अत्यंत व्यापक योगदानों के बावजूद, कृष्णराम भट्ट का जीवन मात्र 49 वर्ष की आयु में उदररोग के कारण समाप्त हो गया। उनकी आयुर्वेद और साहित्य के प्रति निष्ठा उनकी वंश परंपरा में जीवित रही, जिसने उनके ज्ञान को आगे बढ़ाया।
प्रशंसा:- आयुर्वेद और साहित्य में उनके असाधारण योगदान के कारण उन्हें महाभाग (अत्यंत विशिष्ट) और महाकवि की उपाधि प्राप्त हुई।



























































