पंडित कविराज डॉ. अनंत त्रिपाठी

जन्म तिथि :- 10 फरवरी, 1905
जन्म स्थान::- जगन्नाथपुर सासन, गंजाम जिला, ओडिशा, भारत
व्यक्तिगत एवं पारिवारिक विवरण:- पंडित कविराज डॉ. अनंत त्रिपाठी शर्मा का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जो आयुर्वेद और आध्यात्मिक परंपराओं में गहराई से जुड़ा था। उनके पिता श्री गदाधर त्रिपाठी एक प्रसिद्ध वैद्य और ज्योतिषी थे, जबकि उनकी माता श्रीमती मोहिनी देवी एक समर्पित गृहिणी थीं। उनके दादा श्री दामोदर पाधी भी कविराज (आयुर्वेद चिकित्सक) और जगन्नाथपुर सासन के प्रसिद्ध ज्योतिषी थे। इस पारिवारिक विरासत ने डॉ. शर्मा को प्रारंभ से ही आयुर्वेद में मजबूत आधार प्रदान किया। डॉ. शर्मा का विवाह श्रीमती विष्णुप्रिया से हुआ, जिनसे उन्हें नौ संतानें हुईं — एक पुत्र और आठ पुत्रियाँ। 1985 में पत्नी के निधन के बाद भी उन्होंने आयुर्वेद के क्षेत्र में अपना समर्पित कार्य जारी रखा और अपने परिवार की चिकित्सा व सेवा की परंपरा को आगे बढ़ाया।

शैक्षिक योग्यताएँ :-

डॉ. शर्मा की शिक्षा यात्रा आयुर्वेद और शास्त्रीय अध्ययन दोनों में गहन समर्पण से भरी हुई थी। उनकी प्रारंभिक शिक्षा चटशाला (स्थानीय प्राथमिक विद्यालय) से हुई, जिसे उनके बड़े भाई (वाराणसी से शिक्षित संस्कृत विद्वान) ने स्थापित किया था। इसके बाद उन्होंने सरकारी संस्कृत विद्यालय, बारिपदा से व्याकरण मध्यमा की पढ़ाई पूरी की। 1925 में उन्होंने विजयनगरम संस्कृत कॉलेज, आंध्र प्रदेश से प्रतिष्ठित साहित्य शिरोमणि उपाधि प्राप्त की। इसके उपरांत उन्होंने 1927 से 1929 के बीच बिहार संस्कृत परिषद से आयुर्वेद आचार्य की डिग्री प्राप्त की। यह गहन प्रशिक्षण उनके विद्वतापूर्ण और व्यावहारिक जीवन की आधारशिला बना।

व्यावसायिक यात्रा:-

प्रारंभिक करियर: - पंडित कविराज डॉ. अनंत त्रिपाठी शर्मा ने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत ओडिशा के पारलाखेमुंडी इंग्लिश कॉलेज में लेक्चरर के रूप में की। उन्हें वहाँ पढ़ाने का निमंत्रण पारला राजा ने दिया था, जिन्होंने उनकी विद्वता को पहचाना। इस दौरान उन्होंने अंग्रेजी साहित्य का भी अध्ययन किया और इंटरमीडिएट आर्ट्स व बैचलर ऑफ आर्ट्स की डिग्रियाँ प्राप्त कीं। लेकिन उनका हृदय आयुर्वेद की ओर आकृष्ट रहा, जिसके चलते उन्होंने साहित्यिक करियर छोड़कर आयुर्वेद को पूर्णकालिक व्यवसाय बनाया। उन्होंने ओडिशा के कई प्रमुख क्षेत्रों जैसे पारलाखेमुंडी, विजयनगरम और श्रीकाकुलम में क्लीनिक स्थापित किए और विभिन्न समुदायों की सेवा करते हुए प्रभावी उपचारों के लिए ख्याति अर्जित की।

संस्थापक और संस्थागत योगदान:- आयुर्वेद शिक्षा के क्षेत्र में वे एक दूरदर्शी व्यक्तित्व थे। उन्होंने ओडिशा में आयुर्वेद के विकास के लिए कई संस्थाओं की स्थापना की। 1949 में उन्होंने ओडिशा का पहला आयुर्वेद कॉलेज गोबिंदबंधु आयुर्वेद महाविद्यालय, पुरी स्थापित किया। इसके साथ ही उन्होंने कई औषधालय (डिस्पेंसरी) और भेषज मंदिर फार्मेसी की स्थापना की, जहाँ पारंपरिक आयुर्वेदिक दवाएँ तैयार की जाती थीं और क्षेत्रभर में गुणवत्तापूर्ण औषधियों की आपूर्ति की जाती थी। उनके अथक प्रयासों का परिणाम 1978 में कविराज अनंत त्रिपाठी शर्मा आयुर्वेद कॉलेज एवं अस्पताल, ब्रह्मपुर की स्थापना के रूप में सामने आया।

चिकित्सकीय उपलब्धियाँ:- डॉ. शर्मा आयुर्वेदिक निदान और चिकित्सा में विशेष रूप से नाड़ी परीक्षा (पल्स डायग्नोसिस) की विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध हुए। उन्होंने पेप्टिक अल्सर, क्षय रोग, मधुमेह और श्वसन रोग जैसी जटिल बीमारियों का सफलतापूर्वक इलाज किया। उनकी दार्शनिक सोच धर्म (सदाचरण) पर आधारित थी, जिसके अंतर्गत वे रोगी की भलाई को धन से ऊपर रखते थे। चंद्रोदय मकरध्वज जैसी आयुर्वेदिक औषधियों के उनके नवोन्मेषी उपयोग ने उन्हें एक कुशल चिकित्सक के रूप में प्रतिष्ठित किया।

साहित्यिक योगदान:- डॉ. शर्मा ने आयुर्वेद और साहित्य दोनों क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होंने यह महसूस किया कि ओड़िया भाषा में आयुर्वेद ग्रंथों की कमी है, इसलिए उन्होंने चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय जैसे प्रमुख ग्रंथों का ओड़िया में अनुवाद किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने संस्कृत और ओड़िया दोनों भाषाओं में मौलिक रचनाएँ और अनुवाद प्रस्तुत किए, जिससे क्षेत्रीय साहित्य समृद्ध हुआ और आयुर्वेद के प्रति जागरूकता फैली।

राजनीतिक और सामाजिक योगदान:- आयुर्वेद को बढ़ावा देने के साथ-साथ वे समाज सुधार और राजनीति में भी सक्रिय रहे। उन्होंने बाल विवाह का कड़ा विरोध किया और स्थानीय नेताओं के सहयोग से संस्कारक आंदोलन की शुरुआत की, जिससे बाल विवाह संबंधी कठोर कानूनों को हटाने में मदद मिली। वे विधानसभा सदस्य और बाद में सांसद भी बने। इन पदों पर रहते हुए उन्होंने आयुर्वेद को बढ़ावा देने और पारंपरिक चिकित्सा को सरकारी मान्यता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पुरस्कार और सम्मान:- आयुर्वेद और सामाजिक सुधार में डॉ. शर्मा के योगदान के लिए उन्हें अनेक सम्मान प्राप्त हुए। आयुर्वेद और संस्कृत साहित्य पर उनके प्रभाव को मान्यता देते हुए, उन्हें 1978 में भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित राष्ट्रभाषा रत्न की उपाधि से सम्मानित किया गया। उन्हें मिले अन्य सम्मानों में श्रीलंका सरकार द्वारा "आयुर्वेद चक्रवर्ती" और स्वास्थ्य सेवा तथा साहित्य, दोनों में उनके योगदान के सम्मान में "साहित्य शिरोमणि" जैसी उपाधियाँ शामिल हैं।

 

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