
प्रो. (वैद्य) सी. पी. शुक्ल
जन्म तिथि:-1 नवम्बर 1922
जन्म स्थान:भुज, गुजरात
व्यक्तिगत एवं पारिवारिक विवरण:- वैद्य सी. पी. शुक्ल का जन्म श्री प्रभुशंकर देव शुक्ल और श्रीमती तारा लक्ष्मी प्रभु शुक्ल के घर हुआ। उनके पिता एक आदरणीय शास्त्री (अनुष्ठानकर्ता) होने के साथ-साथ संस्कृत के विद्वान और आयुर्वेद में पारंगत थे। वैद्य सी. पी. शुक्ल की पत्नी, श्रीमती अनीला चंद्रकांत शुक्ल, मैट्रिकुलेशन प्रमाणपत्र प्राप्त कर चुकी थीं और द्वितीय श्रेणी की पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिशनर के रूप में सेवा देती थीं। उनके दो संतानें हैं – पुत्र श्रीकांत चंद्रकांत शुक्ल और पुत्री वसंती चंद्रकांत शुक्ल। उनके कुछ पोते-पोतियाँ आज भी उनकी अमर विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
शैक्षिक योग्यताएँ :-
वैद्य सी. पी. शुक्ल ने 1939 में भुज के अल्फ्रेड हाई स्कूल से मैट्रिकुलेशन पूर्ण किया। इस दौरान उन्होंने असाधारण शैक्षणिक क्षमता का प्रदर्शन करते हुए संस्कृत छात्रवृत्ति प्राप्त की और परिवार की विद्वता की परंपरा को आगे बढ़ाया। तत्पश्चात उन्होंने गुजरात के पाटन स्थित श्री उजमशी पितांबरदास आयुर्वेद कॉलेज से आयुर्वेदिक अध्ययन किया और 1943 में लाइसेंसिएट इन आयुर्वेदिक मेडिसिन की परीक्षा उत्तीर्ण की। साथ ही उन्होंने पुणे के तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ से “आयुर्विद्या विशारद” की उपाधि भी अर्जित की।
व्यावसायिक यात्रा:-
चरक संहिता के अनुवाद में अग्रणी योगदान:- 1944 में जामनगर की गुलाबकुंवरबा आयुर्वेदिक सोसाइटी से जुड़ने के बाद, वैद्य सी. पी. शुक्ल ने स्वयं को चरक संहिता के अनुवाद जैसे महान कार्य के लिए समर्पित कर दिया। यह कार्य डॉ. पी. एम. मेहता की अध्यक्षता में प्रारंभ हुआ था, जिसमें आयुर्वेद के अन्य विख्यात विद्वान जैसे श्री यादवजी त्रिकमजी आचार्य और श्री दुर्गाशंकर केवलराम शास्त्री भी सम्मिलित थे। वैद्य शुक्ल ने सूत्रों (सूक्तियों) की व्याख्याओं और टीकाओं की गहन चर्चाओं को विस्तार से समझा और स्पष्ट किया।
स्नातक संकाय और प्राचार्य:- 1946 में जब गुलाबकुंवरबा आयुर्वेद महाविद्यालय की स्थापना हुई, तब वैद्य सी. पी. शुक्ल को वहाँ अपनी सेवाएँ देने के लिए आमंत्रित किया गया। उन्होंने अपने अध्यापन कार्य की शुरुआत क्रियाशरीर विज्ञान (शारीरिकी) से की और बाद में कायचिकित्सा (चिकित्सा शास्त्र) विषय में अध्यापन करने लगे। उनकी निष्ठा, समर्पण और परिश्रम के कारण वे शीघ्र ही महाविद्यालय के प्राचार्य बने और 1954 से 1956 तक अपनी सेवाएँ प्रदान कीं।
स्नातकोत्तर संकाय:- 1956 में वैद्य सी. पी. शुक्ल आयुर्वेद स्नातकोत्तर प्रशिक्षण केंद्र (PGTCA), जामनगर में कायचिकित्सा विभाग में सह-प्राध्यापक के रूप में नियुक्त हुए और 1961 में इसी विभाग में प्राध्यापक बने। 1966 में उन्हें अस्पताल का उप-पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया। 1968 में वे गुजरात राज्य आयुर्वेद निदेशक नियुक्त हुए, किन्तु शिक्षण और नैदानिक शोध में गहरी रुचि के चलते वे पुनः गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय में कायचिकित्सा विभागाध्यक्ष और प्राध्यापक के रूप में लौट आए। उन्होंने 200 से अधिक एम.डी. शोध प्रबंध तथा 5 पीएच.डी. शोध प्रबंध का मार्गदर्शन किया। 1970 से वे आयुर्वेद स्नातकोत्तर शिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (IPGT&RA), गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय में अधिष्ठाता (Dean) पद का दायित्व भी संभालते रहे।
शैक्षणिक सुधार: वैद्य सी. पी. शुक्ल ने आयुर्वेद शिक्षा में व्यापक सुधार हेतु महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके अध्यक्षत्व में गठित समितियों ने 1970 और 1977 में आयुर्वेद की पाठ्यचर्या की समीक्षा और संशोधन का कार्य किया। इन संशोधनों को गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय तथा उस समय की सर्वोच्च नियामक संस्था केंद्रीय भारतीय चिकित्सा परिषद (CCIM) ने स्वीकार किया। उन्होंने यह अनुशंसा की कि छात्रों को उनकी पढ़ाई के प्रथम वर्ष से ही रोगियों और औषधियों का प्रत्यक्ष अनुभव कराया जाए। इसके अतिरिक्त उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि मौलिक सिद्धांत (Basic Principles) और द्रव्यगुण विज्ञान (औषध-गुण विज्ञान एवं फार्माकोलॉजी) जैसे आयुर्वेदिक विषयों का अध्ययन रोगी-देखभाल के संदर्भ में कराया जाना चाहिए। उनका मत था कि आयुर्वेद शिक्षा रोगियों के इर्द-गिर्द केंद्रित होनी चाहिए, जहाँ सिद्धांतों के व्यावहारिक अनुप्रयोग पर ध्यान दिया जाए, न कि केवल सैद्धांतिक व्याख्यानों पर।
अनुसंधान के लिए योग्यता:- वैद्य सी. पी. शुक्ल ने आयुर्वेद में अनुसंधान (Research) के महत्व पर विशेष बल दिया। उन्होंने यह सुझाव दिया कि चरक संहिता से प्राप्त अंतर्दृष्टियों को क्लिनिकल ट्रायल्स की शोध पद्धतियों में समाहित किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी प्रस्तावित किया कि नैदानिक परीक्षणों में मूल्यांकन के मानक केवल लक्षण और परिणाम तक सीमित न होकर, देहबल (शारीरिक शक्ति), अग्निबल (पाचन एवं चयापचय शक्ति), तथा मनোবल (मानसिक शक्ति) को भी सम्मिलित करना चाहिए। उन्होंने परीक्षण औषधियों के दुष्प्रभावों के दस्तावेजीकरण की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ (आरएवी) गुरु:- उन्हें चरक संहिता के लिए RAV द्वारा “गुरु” नामित किया गया और उन्होंने छात्रों को चरक संहिता के उच्च अध्ययन में मार्गदर्शन दिया। इस योजना के माध्यम से गुरु-शिष्य परंपरा की शिक्षण पद्धति को जीवित रखा गया।
पदभार:- वैद्य शुक्ल गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय की सीनेट और सिंडिकेट के सदस्य रहे। उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में “विज़िटर के नामांकित सदस्य” के रूप में नियुक्त किया गया। वे फार्माकोपिया समिति के सक्रिय सदस्य भी रहे। इसके अतिरिक्त वे गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय (जामनगर), राजस्थान विश्वविद्यालय (जयपुर), काशी हिंदू विश्वविद्यालय (वाराणसी), और आंध्र विश्वविद्यालय (हैदराबाद) सहित अनेक विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर एवं पीएच.डी. स्तर पर परीक्षक नियुक्त किए गए। साथ ही, उन्होंने भारत की विभिन्न लोक सेवा आयोगों में आयुर्वेद विशेषज्ञ सलाहकार एवं विषय विशेषज्ञ के रूप में सेवा दी।
साहित्यिक योगदान:- वैद्य सी. पी. शुक्ल श्री गुलाबकुंवरबा आयुर्वेदिक सोसाइटी, जामनगर द्वारा प्रकाशित चरक संहिता के अनुवाद के संपादकीय मंडल के सक्रिय सदस्य रहे। इसके अतिरिक्त, उन्होंने केंद्रीय आयुर्वेद एवं सिद्ध अनुसंधान परिषद (CCRAS), नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित महत्वपूर्ण ग्रंथ हैंडबुक ऑफ डोमेस्टिक मेडिसिन एंड कॉमन आयुर्वेदिक रेमेडीज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यह पुस्तक सामान्य आयुर्वेदिक रोगों, उनके लक्षण-विज्ञान, प्रबंधन के सिद्धांत, एकल एवं मिश्रित औषधियों तथा उनकी विधियों पर व्यापक जानकारी प्रदान करती है। उन्होंने अपने व्यावहारिक अनुभवों को सिद्धांत और नैदानिक अवलोकनों के साथ जोड़कर अनेक शोध-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित किए। इसके अतिरिक्त, उन्होंने अपने पौत्र डॉ. निशांत शुक्ल के साथ मिलकर Illustrated Diabetes Ayurvedic Overview नामक पुस्तक का सह-लेखन भी किया।
( पुरस्कार और सम्मान )



























































